Monday, December 19, 2016

नीतिगत दरों में वृद्धि की संभावना हुई कम : एसोचैम

नीतिगत दरों में वृद्धि की संभावना हुई कम : एसोचैम नई दिल्ली। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर में बढोतरी, डॉलर के मुकाबले रुपए में जारी गिरावट और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल की वजह से रिजर्व बैंक के नीतिगत दरों में कटौती की संभावना लगभग समाप्त होती जा रही है। उद्योग संगठन एसोचैम ने आज अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा कि यह सच है कि नोटबंदी , खुदरा महंगाई दर और थोक महंगाई दर में कमी से बैंकिंग
सिस्टम में अभी काफी तरलता है लेकिन यह सामान्य स्थिति नहीं है।

 जैसे ही बाजार से हटाये गए 500 और 1000 रुपए के नोट बदलकर प्रचलन में आ जाएंगे पूरी परिस्थिति ही बदल जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी डॉलर के 14 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचने से अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं का प्रवाह अमेरिकी अर्थव्यवस्था में होने लगा है। 

अधिकतर उभरते बाजारों से पूंजी निकासी हो रही है, जिससे वहां की मुद्रा पर दबाव बन गया है। संगठन के अनुसार भारत को इस तथ्य से भले ही सांत्वना मिल सकती है कि इस वैश्विक हलचल का उस पर उतना प्रभाव नहीं पड़ा रहा है लेकिन इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि हम दुनिया में कच्चे तेल के सबसे बड़े आयातकों में हैं। 

इसी कारण डॉलर की मजबूती का देश पर सीधा और तत्काल प्रभाव पड़ेगा। इससे आने वाले समय में महंगाई भी बढ़ सकती है।  एसोचैम के अध्यक्ष सुनील कनोरिया ने कहा, रुपए के मजबूत होने से कच्चे तेल का आयात सस्ता हो गया था ,जिससे सरकारी खजाना भी दुरुस्त था और ग्राहक को भी लाभ मिल रहा था लेकिन अब हम धीरे-धीरे इस स्थिति से दूर जा रहे हैं।

 अब, हम ठीक विपरीत हालत में हैं,जहां कच्चे तेल के भाव चढ़ रहे हैं और रुपया कमजोर होता जा रहा है। डॉलर के मजबूत होने से कच्चे तेल की कीमतों पर दोगुना प्रभाव पड़ रहा है। 

एसोचैम के मुताबिक भारतीय मुद्रा का कमजोर होना आयातकों के लिए भले ही नुकसानदेह है लेकिन निर्यातकों के लिए यह लाभदायक है । हालांकि, भारतीय निर्यातकों को भी चीन, विएतनाम, फिलीपींस तथा बंगलादेश से बड़ी टक्कर मिलेगी। चीन की मुद्रा में आई गिरावट से वहां के निर्यातकों को मदद मिली है। युआन के टूटने से अब जापान के पास सबसे अधिक अमेरिकी डॉलर भंडार है। 

उद्योग संगठन के मुताबिक नोटबंदी का असर सकल घरेलू उत्पाद पर दिख रहा है और जीएसटी गतिरोध की वजह से भले ही उद्योग जगत कितना भी ब्याज दर में कमी की उम्मीद पाले रखे लेकिन वृहद स्तर पर यह एक मुश्कल स्थिति होगी।
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