Friday, February 24, 2017

विलुप्तप्राय ओलिव रिडली कछुओं की रिकॉर्ड संख्या में उपस्थिति से चकित पर्यावरणविद्

विलुप्तप्राय ओलिव रिडली कछुओं की रिकॉर्ड संख्या में उपस्थिति से चकित पर्यावरणविद् उड़ीसा के गंजम ज़िले के समुद्री तट पर इन दिनों दिन-रात वन विभाग के  कर्मचारी और स्वयंसेवक मुस्तैद हैं। इनका प्रयास है कि प्रकृति की अद्भुत देन ओलिव रिडले कछुओं के नवजात बच्चों को माँसाहारी पक्षियों और अन्य खतरों से बचाया जा सके। करीब ढाई किलोमीटर में फैले इस समुद्री तट पर इस वर्ष लगभग तीन लाख अस्सी
हज़ार मादा ओलिव रिडले कछुओं ने अंडे देने के लिये अपना बसेरा बनाया है। गौरतलब है कि इस मौसम में ओलिव रिडले कछुए अपने मूल घर से हजारों किलोमीटर का सफर तय करने के बाद उड़ीसा के तट पर पहुँचते हैं। हर साल नवंबर-दिसंबर से लेकर अप्रैल-मई तक उड़ीसा का यह समुद्री तट ऐसी घटनाओं का साक्षी बनता है, जिनके को रहस्य सुलझाने के लिये दुनिया भर के पर्यावरणविद् और पशु प्रेमी बेचैन हैं।

क्यों हैरान हैं पर्यावरणविद्?

पर्यावरण वैज्ञानिक इसलिये हैरान हैं कि क्या कारण है कि ये ओलिव रिडले कछुए हजारों किलोमीटर की यात्रा करके यहाँ अंडे देने आते हैं और क्यों इन अंडों से निकले बच्चे समुद्री मार्ग से वापस हजारों किलोमीटर दूर चले जाते हैं।
सबसे अधिक चकित करने वाला कारण यह है कि लगभग 30 साल बाद यही कछुए जब प्रजनन के योग्य होते हैं, तो ठीक उसी जगह पर अंडे देने आते हैं, जहाँ उनका जन्म हुआ था। समुद्र यात्रा के दौरान वे भारत में गोवा, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश के समुद्री तटों से गुजरते हैं, लेकिन अपनी वंश-वृद्धि और घर बनाने के लिये उड़ीसा के समुद्री तटों की रेत को ही चुनते हैं। दुनिया भर के विशेषज्ञ चकित होने के अलावा अब तक इस रहस्योद्घाटन के संबंध में कुछ भी नहीं कर पाए हैं।
कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ओलिव रिडले कछुए ऐसी जगहों पर अपना बसेरा बनाते हैं जहाँ लवणता कम हो इसीलिये ही ये गंजम ज़िले में रशिकुल्या नदी के समुद्र से लगते मुहाने के पास अपना बसेरा बनाते हैं। हालाँकि बात जब यह आती है कि कैसे ये कछुए समुद्र की लवणता के बारे में अनुमान लगाते हैं तो वैज्ञानिकों के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं मिलता है।
कौन हैं ये चमत्कारी कछुए?

ओलिव रिडले कछुओं को विलुप्तप्राय प्राणियों की श्रेणी में रखा गया है  दुनिया भर में ओलिव रिडले कछुए के घरौंदे महज छह स्थानों पर ही पाए जाते हैं और इनमें से तीन स्थान उड़ीसा में हैं। ये कोस्टारिका में दो तथा मेक्सिको में एक स्थान पर प्रजनन करते हैं। उड़ीसा के केंद्रपाड़ा ज़िले का गरियामाथा समुद्री तट इनका दुनिया में सबसे बड़ा प्रजनन-आशियाना है। इसके अलावा रशिकुल्या और देवी नदी के समुद्र में मिलन स्थल इन कछुओं के दो अन्य प्रिय स्थल हैं।
एक मादा ओलिव रिडले की क्षमता एक बार में लगभग डेढ़ सौ अंडे देने की होती है। ये कछुए हजारों किलोमीटर की यात्रा के बाद समुद्री तटों की रेत खोद कर अंडे रखने की जगह बनाते हैं। ये अंडे 60 दिनों में फूटते हैं व उनसे छोटे-छोटे कछुए निकलते हैं। ये नन्हें जीव रेत पर घिसटते हुए एक लंबी यात्रा के लिये समुद्र में उतर जाते हैं, इस विश्वास के साथ कि वे वंश-वृद्धि के लिये 30 साल बाद ठीक इसी स्थान पर आएंगे, लेकिन समाज की लापरवाही इनकी बड़ी संख्या को असामयिक काल के गाल में ढकेल देती है। ये कछुए समुद्र में गहराई में तैरते हैं लेकिन चालीस मिनट के बाद इन्हें साँस लेने के लिए समुद्र की सतह पर आना पड़ता है।
निष्कर्ष

विदित हो कि इन कछुओं को सबसे बड़ा नुकसान मछली पकड़ने वाले ट्रॉलरों से होता है। वैसे तो ये कछुए समुद्र की गहराई में तैरते हैं लेकिन चालीस मिनट के बाद इन्हें साँस लेने के लिये समुद्र की सतह पर आना पड़ता है और इस दौरान ये मछली पकड़ने वाले ट्रॉलरों की चपेट में आ जाते हैं। हालाँकि इस संबंध में उड़ीसा हाईकोर्ट ने आदेश दे रखा है कि कछुए के आगमन के रास्ते में संचालित होने वाले ट्रॉलरों में टेड यानी टर्टल एक्सक्लूजन डिवाइस( एक ऐसा यंत्र जिससे कछुए मछुआरों के जाल में नहीं फँसते) लगाई जाए। यह चिंतनीय है कि इस आदेश का सख्ती से पालन नहीं होता है।
सरकार का आदेश है कि समुद्र तट के 15 किलोमीटर इलाके में कोई ट्रॉलर मछली नहीं पकड़ सकता लेकिन इस कानून का क्रियान्वयन सुनिश्चित नहीं किया जा सका है। "फैंगशुई" के बढ़ते प्रचलन से भी कछुओं की शामत आ गई है। इसे शुभ मानकर घर में पालने का चलन बढ़ रहा है। विदित हो कि कछुए जल-पारिस्थितिकी के संतुलन में अहम भूमिका निभाते हैं और ओलिव रिडले कछुए तो प्रकृति की चमत्कारी देन हैं। 
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