Saturday, February 11, 2017

भारत का वास्तविक कार्बन कर अत्यधिक है

भारत का वास्तविक कार्बन कर अत्यधिक है क्योटो प्रोटोकॉल के 20 वर्ष पश्चात्, जलवायु परिवर्तन के न्यूनीकरण के साधनों के लिये अब अधिक जागरूकता और समर्थन प्राप्त है| यदि आज ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसे ही समान कर को लागू करने का प्रस्ताव लाया जाए तो अवश्य ही पारित होगा तथा इसे पूरा समर्थन मिलेगा| यहाँ तक कि चीन भी एक उत्सर्जन व्यापार प्रणाली लाने के लिये सक्रियता दिखा रहा है जिससे कार्बन पर अप्रत्यक्ष
कीमत आरोपित होगी|
गौरतलब है कि कुल 194 देशों ने उत्साहपूर्वक पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर किये थे और एक समयबद्ध व आक्रामक तरीके से हरित गैस उत्सर्जन को कम करने की प्रतिबद्धता जाहिर की थी|
राष्ट्रपति बराक ओबामा और शी जिनपिंग ने एक साथ पिछले वर्ष एक प्रतीकात्मक समारोह में पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर किये थे, परन्तु वर्तमान में डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में यह आशंका बनी हुई है कि अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय पेरिस समझौते से पीछे भी हट सकता है| 
पृष्ठभूमि 

जूलिया गिल्लार्ड (ऑस्ट्रेलिया की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री) ने जुलाई 2012 में विधानमंडल के दोनों सदनों से अनुमति लेकर कार्बन कर की शुरुआत की थी|
इस कर का मूल्य एक टन कार्बन के लिये 23 डॉलर था जिसे तीन वर्षों के आरंभिक समय के लिये निश्चित किया गया था| इसका प्रभाव यह रहा कि एक वर्ष से पहले ही उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया| इस प्रकार कार्बन कर के विरोध में इतनी तेज़ प्रतिक्रिया दी गई |
इसे उद्योगों तथा ऊर्जा की कीमतों में एक ऐसे अनावश्यक बोझ के तौर पर देखा गया जिसने ऑस्ट्रेलिया की प्रतिस्पर्द्धात्मकता को चोट पहुँचाई और इसे महँगाई की ओर धकेल दिया|
जुलाई 2014 से सीनेट ने देश में कार्बन कर को निरसित कर दिया| स्मरणीय है कि ऑस्ट्रेलिया उन दो देशों में से एक है जिन्होंने वर्ष 1997 में वैश्विक हरित गैसों के उत्सर्जन को कम करने हेतु लाए गए ऐतिहासिक क्योटो प्रोटोकॉल की पुष्टि नहीं की थी| इनमें दूसरा देश अमेरिका था|
यहाँ सोचने वाली बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में भारत की स्थिति क्या है? गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना वर्ष 2008 में लागू की गई थी| इसके आठ लक्ष्य क्रमशः जल, ऊर्जा कुशलता, सौर ऊर्जा, सतत आवास, कृषि, वानिकी, हिमालयी पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन पर सामरिक ज्ञान थे| 
अतः स्वच्छ ऊर्जा के लिये कार्य के सन्दर्भ में जलवायु परिवर्तन के न्यूनीकरण और वैश्विक तापन के विरुद्ध की गई भारत की प्रतिबद्धता संदेहयुक्त नहीं है| पर्यावरणीय सक्रियता के लिये भारत की पहल और रणनीति को स्टॉकहोम में वर्ष 1972 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र सम्मलेन में अपनाया गया था |

अन्य पक्ष 

सवाल यह है कि कहीं  भारत अपनी विकासीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये अपने ऊर्जा संसाधनों को स्वच्छ ऊर्जा में परिवर्तित करने के लिये अति तो नहीं कर रहा है? 
स्पष्ट है कि यह पहले ही यह विशेष चर्चा का विषय रहा है कि बढ़ती गर्मी वैश्विक तापन को और बढ़ा सकती है या इसकी स्थिति को और ख़राब कर सकती है| वर्तमान में भारत तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है| 
गौरतलब है कि कोयला उपकर जो कुछ वर्ष पहले लगाया गया था, अब 400 रुपए प्रति टन है जो कि एक टन कोयला खनन में लगने वाली लागत के पाँचवे हिस्से के बराबर है|
कोयला भण्डार की दृष्टि से भारत का विश्व में तीसरा स्थान है, यानी भारत में कोयले का तीसरा सबसे बड़ा अक्षय निधि है जिसे प्रति व्यक्ति ऊर्जा उपभोग की सस्ती दरों पर ऊर्जा प्रदान कर दोगुना किया जा सकता है| लेकिन अंधाधुंध नीलामी (सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद) और उपकर लगाए जाने के बाद भारत कोयले से विद्युत ऊर्जा का उत्पादन करने वाला सबसे महँगा देश बन गया है| 
इसके साथ ही, हमारे यहाँ पहले से ही सभी विद्युत वितरण कंपनियों और बंदी उत्पादकों (captive producers) के लिये अक्षय ऊर्जा खरीद दायित्व (renewable purchase obligations (RPOs)) तंत्र विद्यमान है| ध्यान दिये जाने की बात है कि राज्य सीमा के अन्दर व बाहर पर्याप्त मात्रा में खरीदारी के लिये सौर और पवन ऊर्जा उपलब्ध नहीं है| अभी तक सौर ऊर्जा संसाधनों से ऊर्जा प्राप्ति व्यापक रूप में सुनिश्चित नहीं हो पाई है, साथ ही,  RPOs का भार भी प्रतिवर्ष बढ़ ही रहा है जो ऊर्जा लागत को बढ़ा रहा है|
इसके अलावा, पेट्रोल और डीज़ल के उत्पाद कर में भी वृद्धि हो रही है| आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक जुलाई 2014 से पेट्रोल उत्पाद कर में 150% की वृद्धि हुई है और डीज़ल उत्पाद कर में इससे भी ज़्यादा की वृद्धि देखी गई है| 
वर्तमान में भारत पेट्रोलियम पदार्थों पर सबसे अधिक कर आरोपित करने वाला राष्ट्र है| ये और कुछ नहीं बल्कि वास्तविक कार्बन कर ही है| धीरे-धीरे डीज़ल और पेट्रोल पर बढ़ते करों के कारण केंद्रीय सरकार के पिछले दो वित्तीय वर्षों में कर संग्रहण में 40% की वृद्धि हुई है| 
गौरतलब है कि जब आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री गिल्लार्ड ने इस्तीफा दिया था, तो यूरोप में मौजूदा कार्बन क्रेडिट व्यापार 1 डॉलर प्रति टन से भी नीचे चला गया था | इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कार्बन कर के खिलाफ ऑस्ट्रेलियाई एक साथ थे|
ऐसा नहीं है कि भारत को ग्रीनहाउस गैसों को रोकने के वैश्विक संयुक्त प्रयासों से दूर रहना चाहिये| हरित ऊर्जा के अलावा जलवायु परिवर्तन को कम करने के क्षेत्र में भी रोज़गार सृजन की अपार संभावना है|
भारत में वर्ष भर धूप मौजूद होती है| अतः सौर ऊर्जा भारत की ऊर्जा आवश्यकता को पूरा कर सकती है| इलेक्ट्रिक वाहन जो अभी नवजात उद्योग है, वास्तव में  तेल और भू-राजनीति के अर्थशास्त्र को बदल सकता है|
हालाँकि, भारत जिसकी प्रति व्यक्ति विद्युत ऊर्जा खपत वैश्विक औसत ऊर्जा उपभोग की आधी है और विश्व में कार्बन कर की दर सबसे अधिक है, उसे इस पर चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है| 
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