Monday, April 10, 2017

नए शिखर पर भारत-बांग्लादेश संबंध

नए शिखर पर भारत-बांग्लादेश संबंध

यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनका यह दौरा भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए ऐतिहासिक है। जनवरी, 2009 में दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद से वह अपने देश को आर्थिक प्रगति की दिशा में ले जाने के लिए भरसक प्रयास कर रही हैं और किसी बदले की भावना से काम नहीं कर रही हैं। उनके कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई है। वह पिछली बार करीब सात साल पहले भारत आई थीं। वह एक आधिकारिक यात्रा थी। इस बार वह राजकीय यात्रा पर हैं। उनके पिछले दौरे में दोनों देशों के बीच कई ऐतिहासिक समझौते हुए थे जिनमें पहली बार नदी बेसिन प्रबंधन पर सहमति भी शामिल थी। दोनों देशों के रिश्तों में हमेशा नदी जल बंटवारे की बहुत अहमियत रही है। हम एक बार में एक ही नदी पर बात करते हैं। सबसे पहले हमने गंगा (1996) पर बात की और फिर दूसरी नदियों पर। लेकिन यह बहुत लंबी और विस्तारित प्रक्रिया थी और संभवत: शेख हसीना को लगा कि यह पर्याप्त नहीं है। भारत के साथ संबंधों को लेकर उनका हमेशा से राष्टï्रवादी और जनोन्मुखी रवैया रहा है। वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से उन्होंने अपनी विदेश नीति में पड़ोसियों को प्राथमिकता देने की नीति अपनाई और उनकी इस नीति को सबसे अधिक सफलता बांग्लादेश में मिली। भारत और बांग्लादेश के कई साझा हित हैं जिनमें शांतिपूर्ण समाज, लोकतंत्र के प्रति समर्पण, आर्थिक विकास और बहुलवादी समाज शामिल है। मोदी की बांग्लादेश यात्रा भी बहुत सफल रही थी और उस समय बना माहौल अभी भी जारी है।

भारत-बांग्लादेश रिश्तों में ऊर्जा की खास अहमियत हो गई है....
बांग्लादेश अच्छी तरह जानता है कि ऊर्जा के बिना उसका विकास नहीं हो सकता। इसलिए भारत बांग्लादेश को खुलना और त्रिपुरा के जरिये बिजली की आपूर्ति कर रहा है। इसने दोनों देशों के रिश्तों में बहुत फर्क पैदा किया है।

लेकिन गैस का मुद्दा हमेशा मौजूद रहा है। बांग्लादेश हमेशा से कहता रहा है कि उसे अपने यहां गैस के भंडार के बारे में पता नहीं है, लेकिन दूसरों को गैस खोजने भी नहीं देता....
हां, यह बात सही है। भारत ने म्यांमार के सिटवे में गैस की खोज के लिए निवेश किया था और वहां गैस खोज निकाली। लेकिन समस्या यह है कि हम उस गैस को भारत कैसे लाएं? पाइपलाइन बिछाने का भी मसला उठा। दूसरी बात यह है कि बांग्लादेश हमेशा से गैस के दम पर विकास करना चाहता है। लेकिन दोनों योजनाएं जमीन पर नहीं उतरीं। गैस पाइपलाइन की योजना परवान नहीं चढ़ी। हमें गैस के लिए पैसा मिला लेकिन गैस चीन ले जा रहा है। बांग्लादेश का गैस के दम पर आगे बढऩे का सपना भी फलीभूत नहीं हो पाया। हमें पता नहीं कि इसका कारण क्या रहा। क्या बांग्लादेश अपने गैस भंडार का सही पता नहीं लगा पाया या फिर गैस भंडार के कुप्रबंधन के कारण ऐसा हुआ। सच्चाई यह है कि बांग्लादेश में काम कर रहीं अंतरराष्टï्रीय पेट्रोलियम और गैस कंपनियों की दिलचस्पी खत्म हो गई है और इनमें से कई वहां से बोरिया बिस्तर समेट चुकी हैं। वह दौर अब गुजर चुका है। इसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश अब विकास के लिए ऊर्जा के दूसरे स्रोतों को तलाश रहा है। अब उसकी सोच अलग है। भारत, बांग्लादेश और भूटान एक जलविद्युत योजना पर काम कर रहे हैं। इसे भूटान में बनाया जाएगा और इससे पैदा होने वाली बिजली की आपूर्ति भारत के जरिये बांग्लादेश को की जाएगी। अभी बांग्लादेश को सभी पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति चटगांव बंदरगाह से होती है। यह एक जटिल प्रक्रिया है- बंदरगाह पर तेल उतरता है और फिर वहां से सड़क के जरिये उसे दूसरी जगह भेजा जाता है। हमने कहा है कि हमारे पास नुमालीगढ़ तेल शोधक कारखाना है और हम बांग्लादेश को पाइपलाइन के जरिये तेल दे सकते हैं। इससे लागत और प्रदूषण में कमी आएगी। साथ ही परिवहन की जटिलता कम होगी। दोनों देशों को पेश आ रही समस्याओं को सुलझाने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। कोई दो-राय नहीं है कि बांग्लादेश विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है। वहां की विकास दर 6 फीसदी से अधिक है जो एक बड़ी उपलब्धि है।

तीस्ता की समस्या अभी भी क्यों बनी हुई है?
गंगा जल समझौता अच्छी तरह काम कर रहा है लेकिन इसमें भी एक बड़ी समस्या है। वह है नदी में गाद। भारत में भी अभी तक गाद निकालने की शुरुआत नहीं हुई है। बांग्लादेश ने 1975 में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद से गाद निकालने वाली एक भी मशीन नहीं खरीदी है। हम कह रहे हैं कि हम मदद करेंगे और सीमावर्ती नदियों में संयुक्त रूप से गाद निकालेंगे। गाद निकालने से भारी फर्क पैदा होगा। गंगा की ओर इतना गाद जमा हो गया है कि पानी दूसरी तरफ नहीं जा रहा है। जाहिर सी बात है कि दूसरा पक्ष शिकायत करेगा कि उस पानी रोक दिया गया है। गंगा में अंग्रेजों के जमाने से पानी का बहाव मापा जाता है। तीस्ता के बारे में कोई नहीं जानता कि उसमें कितना पानी है। बरसात में कितना पानी रहता है और गर्मियों में कितना। जिन हिमनदों से तीस्ता में पानी आता है वे तेजी से घट रहे हैं। इसलिए गर्मियों में तीस्ता में पानी का स्तर लगातार घट रहा है। इसलिए आपको इस समस्या को केवल पानी के बहाव की दृष्टिï से ही नहीं देखना है। यह नदी बेसिन प्रबंधन का मामला है। उदाहरण के लिए किसी खास बेसिन में नदी का प्रवाह इतना कम है कि आप धान नहीं उगा सकते। आपको किसानों को यह सलाह देनी होगी कि वे ऐसी फसल उगाएं जिसमें कम पानी की जरूरत होती है। इसे वैज्ञानिक रूप से और मिलकर करने की जरूरत है। इसे व्यावहारिक बनाया जाना चाहिए।

जिस तरह उल्फा की समस्या से निपटा गया, वह भारत-बंगलादेश संबंधों में मील का एक पत्थर है....
भारत ने खालिदा जिया सरकार से कई बार उल्फा की गतिविधियों के बारे में शिकायत की थी लेकिन उसने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की। उल्फा ने दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश यात्रा की निंदा की है जिससे साफ है कि वह किसकी शह पर काम कर रहा है। लेकिन शेख हसीना ने हमेशा कहा है कि वह अपने यहां भारत विरोधी गतिविधियों की अनुमति नहीं देंगी। पिछली सरकार भी यही कहती थी लेकिन उसने कभी इस पर अमल नहीं किया। खालिदा जिया उल्फा को स्वतंत्रता सेनानी कहती थीं। अदालत में उल्फा के नेता अनूप चेतिया के वकीलों में खालिदा जिया सरकार में एक मंत्री की पत्नी भी शामिल थीं। लेकिन शेख हसीना ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया। उन्होंने आतंकवाद को खत्म करने में राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई है क्योंकि वह इस बात को अच्छी तरह समझती हैं कि बंगलादेश की जनता खूनखराबा नहीं चाहती है।

लेकिन बांग्लादेश में कट्टïर इस्लाम तेजी से बढ़ा है और एक संसदीय विपक्ष की गैरमौजूदगी में उसकी जगह भी ले सकता है....
पिछली खालिदा जिया सरकार के समय जमात उल मुजाहिदीन नाम का एक संगठन था जिसमें 9/11 की घटना के बाद अफगानिस्तान से लौटे लोग शामिल थे। तत्कालीन सरकार ने इसे कपोल कल्पना बताते हुए कहा था कि इसका कोई वजूद नहीं है। फिर एक दिन देशभर में 500 धमाके हुए। वे कम क्षमता के बम थे। इन धमाकों में कोई घायल नहीं हुआ लेकिन यह ताकत का प्रदर्शन था। इस घटना ने लोगों में रोष पैदा किया। लोगों का कहना था कि यह वह बंगलादेश नहीं है जो हमने चाहा था। उसके बाद हुए चुनावों में शेख हसीना को दो तिहाई बहुमत मिला। पिछली सरकार के दौरान भारत में होने वाले हर आतंकवादी हमले के तार बांग्लादेश से जुड़ते थे। पाकिस्तान की खालिदा जिया सरकार से बहुत अच्छी बनती थी इसलिए वह कश्मीर के बजाय बांग्लादेश से भारत में आतंकवादी भेजता था। इसका एक और पहलू भी है। जब शेख हसीना सत्ता में आई तो उन्होंने मुक्ति संग्राम के मामलों को शुरू कराया। यह एक भावुक राष्टï्रवादी मामला था। उन्होंने इसलिए ऐसा किया क्योंकि उन्हें महसूस हुआ कि युवा ऐसा चाहते हैं। जब भी किसी को मृत्युदंड से कम सजा मिली तो युवा विरोधस्वरूप सड़कों पर उतर आए। इससे साबित होता है कि लोगों में कितना गुस्सा था। जाहिर बात है कि पाकिस्तानी इससे खुश नहीं थे। तुर्की ने इसमें हस्तक्षेप करने की कोशिश की लेकिन शेख हसीना नहीं मानीं। इसका परिणाम यह हुआ कि अब बांग्लादेश के रास्ते आतंकवादियों का रास्ता बंद हो गया है। यह सही है कि बांग्लादेश के जरिये नकली नोट भारत में आ रहे हैं लेकिन अब यह पहले जितना आसान नहीं रह गया है।
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