Friday, April 14, 2017

स्वतंत्र राजकोषीय परिषद की वकालत

स्वतंत्र राजकोषीय परिषद की वकालत

वित्तीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) समिति ने दुनिया की 40 विकसित व उभरती अर्थव्यवस्थाओं के अध्ययन के बाद राजकोषीय परिषद के गठन की सिफारिश की है। बुधवार को सार्वजनिक की गई समिति की रिपोर्ट में राजकोषीय परिषद को स्वायत्त निकाय बनाने की सिफारिश की गई है, लेकि न साथ ही इसे वित्त मंत्रालय के अधीन रहने की भी बात की गई है। 
 
समिति की सिफारिशों के मुताबिक राजकोषीय परिषद को किसी भी वित्त वर्ष में की गई सरकार की राजकोषीय घोषणाओं की निगरानी का काम सौंपा जाएगा, जो उसे देखते हुए अपने अनुमान व विश्लेषण पेश करेगी और वित्त मंत्रालय को सलाह देगी। समिति ने कहा है, 'यह प्रस्ताव किया गया है कि परिषद में चेयरपर्सन और दो सदस्य होंगे, जिनकी नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी। इन पदों पर ऐसे लोगोंं की नियुक्ति होगी जिन्हें सार्वजनिक वित्त, अर्थव्यवस्था या सार्वजनिक मामलों का भरपूर ज्ञान हो।'
 
रिपोर्ट में कहा गया है, 'परिषद के कामकाज की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए सरकार की सेवा में कार्यरत लोगों की नियुक्ति न करने, 4 साल की स्थायी अवधि, जिसका नवीकरण न हो, कार्यकाल के दौरान वेतन में कटौती न करने और सीमित आधार पर ही उन्हें निलंबित किए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए।' यह प्रस्ताव मसौदा ऋण प्रबंधन और राजकोषीय दायित्व विधेयक का हिस्सा है। अगर समिति की सिफारिशें सरकार स्वीकार कर लेती है तो यह मौजूदा एफआरबीएम अधिनियम की जगह ले लेगा। राजकोषीय परिषद या इस तरह का कोई निकाय तभी कानूनी रूप ले सकता है जब विधेयक पारित हो जाएगा। 
 
रिपोर्ट में कहा गया है, 'परिषद दोहरी भूमिका में होगी। यह अर्थव्यवस्था के व्यापक चरों जैसे वास्तविक व मामूली जीडीपी वृद्धि, कर में उछाल, जिंस की कीमतों के बारे में स्वतंत्र अनुमान उपलब्ध कराएगी, साथ ही राजकोषीय अनुशासन से हटने और उस पर फिर वापस आने को लेकर संस्थान के रूप में सलाह देगी।' परिषद वित्तीय अनुशासन से हटने का प्रावधान रखेगी, जिससे केंद्र सरकार को लचीलापन मिल सके और वह किसी भी साल परिभाषित आपात परिस्थितियों में राजकोषीय खाके से 0.5 प्रतिशत तक विचलित हो सके। अनुशासन से हटने का प्रावधान राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे युद्ध, प्राकृतिक आपदा जिसमें भारी नुकसान हो और कृषि के बर्बाद होने जैसी स्थिति के लिए किया गया है। 
 
समिति ने कहा है कि हाल के वर्षों में राजकोषीय नियमों की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए तमाम अर्थव्यवस्थाओं में स्वतंत्र निकायों का इस्तेमाल बढ़ा है। इसमें कहा गया है, 'खासकर राजकोषीय परिषद की परिकल्पना स्वतंत्र, गैर पक्षपातपूर्ण एजेंसी, सरकार के राजकोषीय प्रदर्शन के सार्वजनिक रूप से आकलन के लिए की गई है।' समिति की रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर देशों ने राजकोषीय परिषद की राह 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद और 2005 से 2015 के बीच अपनाई है।
 
समिति ने कहा है कि इस तरह के निकायों के विभिन्न मॉडल मौजूद हैं। जर्मनी, आयरलैंड, पुर्तगाल और हंगरी जैसे देशों ने राजकोषीय दायित्वों के हिस्सा के दौर पर एकल संस्थान स्थापित किए हैं। अमेरिका, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, ऑस्टे्रलिया, कनाडा, इटली और दक्षिण अफ्रीका ने विधायी शाखा के रूप में इसका गठन किया है, जिसके व्यापक अधिकार हैं। ऐसी परिषदें भी हैं, जो कार्यकारी शाखा के तहत आती हैं। यह व्यवस्था बेल्जियम, जापान, नीदरलैंड और ब्रिटेन में है। वहीं फ्रांस और फिनलैंड में कुछ अन्य वित्तीय संस्थानों से जुड़ी हुई हैं। 
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