Saturday, May 6, 2017

निर्भया मामले में चार दोषियों को फांसी की सज़ा

 निर्भया मामले में चार दोषियों को फांसी की सज़ा

सुप्रीम कोर्ट ने 2012 के निर्भया दुष्कर्म और हत्या मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा चार दोषियों मुकेश, अक्षय, पवन और विनय को सुनाई गई सज़ा-ए-मौत को बरकरार रखा है। न्यायमू्र्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन न्या याधीशों की पीठ ने फ़ैसले में कहा कि पीड़िता के बयान में कोई विरोधाभास नहीं था और इसे उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार सही पाया गया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले ने देश में शोक की सुनामी पैदा कर दी थी। देश की बेटी निर्भया के साथ आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने भी इंसाफ किया। अदालत ने जैसे ही सजा-ए-मौत का ऐलान किया कोर्ट रूम में मौजूद सभी लोगों ने तालियां बजाकर इस फैसले का स्वागत किया और पूरे देश में खुशी की लहर दौड पड़ी। निर्भया के परिवार ने इस फैसले का स्वागत किया है। 
16 दिसंबर, 2012 की रात दक्षिणी दिल्ली के मुनीरका में जो कुछ भी हुआ उसने देश में एक नयी क्रांति को जन्म दिया। 6 लोगों ने 23 साल की मेडिकल स्टूडेंट के साथ चलती बस में गैंगरेप किया गया। रेप और उसके बाद हुए वीभत्स अत्याचार ने लोगों के मन में जो गुस्सा पैदा किया था उसे पूरे देश ने महसूस किया। इसके बाद करीब साढ़े चार साल तक चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस कांड के चार आरोपियों की फांसी की सजा बरकरार रखी। निचली अदालत और फिर हाईकोर्ट में चारो दोषियों अक्षय ठाकुर, विनय शर्मा, पवन गुप्ता और मुकेश को मिली फांसी की सजा के खिलाफ दायर अर्जी को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस बर्बरता के साथ अपराध हुआ उसे माफ नहीं किया जा सकता।

जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली वाली बेंच ने सुनवाई के बाद 27 मार्च को फैसला सुरक्षित रखा था। दोपहर 2 बजकर 3 मिनट पर सुप्रीम कोर्ट के तीनों जज- जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस आर भानुमति कोर्ट में आए। तीनों जजों ने ही सर्वसम्मति ने फांसी की सजा बरकरार रखने का फ़ैसला सुनाया।

अदालत ने अपने फैसले में पूरे विस्तार से घटना की जानकारी दी और बताया कि गैंगरेप के बाद पीड़िता के साथ किस तरह बर्बरता से व्यवहार किया गया और कैसे उसने दर्द झेला। अदालत ने कहा- "घटना समाज को हिला देने वाली थी। घटना को देखकर लगता है कि ये धरती की नहीं बल्कि किसी और ग्रह की है। घटना के बाद सदमे की सुनामी आ गई। इस अपराध की किस्म और इसके तरीके ने सामाजिक भरोसे को नष्ट कर दिया और यह रेयरेस्ट ऑफ द रेयर की श्रेणी में आता है, जिसमें मौत की सजा दी जानी चाहिए। घटना को बर्बर और बेहद क्रूर तरीके से अंजाम दिया गया। दोषियों ने पीड़ित की अस्मिता लूटने के इरादे से उसे सिर्फ मनोरंजन का साधन समझा। फ़ैसले में रहम की गुंजाइश नहीं है।"

अदालत ने कहा कि पीड़िता ने संकेतों के सहारे मृत्यु से पूर्व अपना बयान दिया क्योंकि उसकी हालत बहुत ही खराब थी परंतु उसके इस बयान में तारतम्यता थी, जो संदेह से परे सिद्ध हुई। पीठ ने यह भी कहा कि चारों दोषियों, राम सिंह और किशोर की आपराधिक साजिश साबित हो चुकी है। इस वारदात के बाद उन्होंने पीड़ित और उसके दोस्त को बस से बाहर फेंकने के बाद उनपर बस चढ़ा कर सबूत नष्ट करने का प्रयास किया।

अलग से दिए अपने फ़ैसले में जस्टिस भानुमति ने कहा, "मौत की सजा सुनाने के लिए अगर इस केस को रेयरेस्ट ऑफ रेयर नहीं कहा जाएगा तो फिर किसे कहेंगे। दोषियों की पृष्ठभूमि, उम्र, कोई आपराधिक रिकॉर्ड न होना और जेल में अच्छा बर्ताव जैसी चीजें कोई मायने नहीं रखतीं।"

फ़ैसला सुनते ही कोर्ट में मौजूद लोगों ने तालियां बजाकर अदालत के फ़ैसले का जोरदार स्वागत किया। परिवार भी फैसले से संतुष्ट दिखा और उसने कहा कि हम आगे भी इस तरह की लड़ाई लड़ते रहेंगे।

फ़ैसले के बाद भी इन चारों दोषियों को फांसी की सजा मिलने में अभी वक्त लग सकता है। इसकी वजह है कि ये इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू और इसके बाद क्यूरेटिव पिटीशन दायर कर सकते हैं। अगर यहां भी राहत नहीं मिलती है तो वे राष्ट्रपति के पास दया याचिका दे सकते हैं।

16 दिसंबर, 2012 को 6 बदमाशों ने निर्भया से बर्बरता के साथ चलती बस में गैंगरेप किया था। बाद में उसे और उसके दोस्त को रास्ते में फेंक दिया था। इस घटना के बाद पीड़िता की हालत बेहद बुरी थी और बाद में इलाज के दौरान सिंगापुर में उसकी मौत हो गई थी।

सुनवाई के बाद साकेत स्थित फास्ट ट्रैक कोर्ट ने इन चारों को गैंगरेप और हत्या के लिए दोषी करार दिया था। 13 सितंबर, 2013 को चारों को हत्या के लिए फांसी की सजा सुनाई गई थी और कोर्ट ने मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर माना था। बाद में हाईकोर्ट ने फैसले को बरकरार रखा।

मामले के ट्रायल के दौरान एक आरोपी राम सिंह ने तिहाड़ जेल में फांसी लगा ली थी, जबकि छठां आरोपी नाबालिग था, जिसे 3 साल तक जुवेनाइल होम में रखने का आदेश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने आज के फैसले से संदेश देने की कोशिश की है कि इस तरह के बर्बरतापूर्ण अपराध के लिए नरमी की कोई गुंजाइश नहीं है।
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